सोमवार, 19 मई 2014

दुलारे भैया (संस्मरण): भाग-१





इस संस्मरण को लिखने के पीछे मेरा मुख्य मकसद एक प्रश्न है, जो अक्सर मेरे दिलो-दिमाग को झिंझोड़ता है कि आखिर क्यों हम मुसलमान और आतंकवाद को साथ-२ जोड़कर चलते हैं, क्यों हमें हर मुस्लिम में एक आतंकवादी ही दिखाई देता है; क्यों हम एक मुसलमान में एक भाई, एक पिता, एक बेटा, एक दोस्त और सबसे बढ़कर एक इंसान नहीं देख पाते। क्या धर्म अलग होते ही इंसान और इंसानियत के मायने बदल जाते हैं? ईश्वर या खुदा जो भी कहें उसे, जब उसने इंसान बनाने में भेदभाव नहीं किया, तो हम कौन होते हैं ये अन्तर पैदा करने वाले? आज मैं आपको एक ऐसे इंसान से मिलवाने जा रही हूँ, जो एक मुस्लिम तो है ही, उससे भी बढ़कर एक इंसान है, जिसमें इंसानियत कूट-२ कर भरी है, ताकि आगे से आप कभी किसी व्यक्ति से मिलें, तो उसमें हिन्दू और मुसलमान देखने के बजाय इंसान देखने की कोशिश करें। एक प्रमुख बात जिसकी ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहती हूँ, वो ये कि बुराई किसी धर्म में नहीं, बल्कि उससे जुड़ी कट्टरता में होती है। अगर ये कट्टरता हम धर्म के बजाय इंसानियत में दिखाएँ, तो ये दुनिया रहने के लिए कहीं एक बेहतर जगह बन जाएगी।

दुलारे से हमारी मुलाकात सितम्बर २००५ में हुई, जब हमारे घर पर गाड़ी खरीदने का निश्चय किया गया। वो था तो हमारा ड्राइवर, पर कुछ ही दिनों में घर के एक सदस्य की तरह लगने लगा था। घर में या बाहर, कोई भी और किसी भी तरह की परेशानी हो, सभी लोगों की जुबान पर एक ही नाम रहता था, दुलारे का। हम सभी बच्चे उन्हें ‘दुलारे भैया’ कह कर बुलाते थे। वो भी एक बड़े भाई की तरह हमारा ध्यान रखते थे। बात चाहे बाज़ार जाकर सामान लाने की हो या घर के किसी काम की, कोई त्योहार हो या घर का कोई विशेष आयोजन, हर काम में आगे बढ़कर हाँथ बँटाते थे हमारे दुलारे भैया। यहाँ तक कि उन्होंने अपने घर में बनने वाली ‘स्पेशल बिरयानी’ भी मुझे बनानी सिखाई; हालांकि ये बात अलग है कि उसे मेरे लिए नॉनवेज से बदलकर वेज़ का रूप दिया गया था। बाज़ार में दुकानदारों से भी हमारे लिए मोल-तोल करने के लिए लड़ जाते थे वे।

हमारे लिए तो वे रक्षा-कवच थे ही, दूसरों की मदद करने में भी हमेशा आगे रहते थे। एक बार कहीं जाने के लिए हम उनका इन्तजार कर रहे थे, २ घण्टे होने पर भी वे नहीं आए और ना ही फ़ोन ही रिसीव कर रहे थे। हमें गुस्सा भी आ रहा था, साथ ही साथ चिन्ता भी हो रही थी कि वो कहीं मुसीबत में ना फ़ँस गए हों। जब वे आए और हमें पूरी बात मालूम चली, तो सिर गर्व से ऊँचा हो गया हमारा। असल में हुआ ये था कि जी. टी. रोड चौराहे पर एक बड़े गड्ढे की वजह से जाम लग गया था, जिसे खुलवाने में पुलिस भी नाकाम हो रही थी। दुलारे भैया को जब ये पता चला, तो उन्होंने हमारे घर आने की बजाय वहाँ जाकर मदद करना ज्यादा जरूरी समझा। उन्होंने सबसे पहले २ आदमियों को साथ लेकर सड़क के किनारे पड़े ईंट, मिट्टी और कचरे से उस गड्ढे को भरा, फ़िर एक-२ करके गाड़ियों को निकाला। सभी उनकी तारीफ़ करते हुए और दुआएँ देते हुए जा रहे थे। आज के युग में लोगों को जहाँ सिर्फ़ अपना स्वार्थ दिखाई देता है, उनका इस तरह सबकी मदद करना, उन्हें लोगों की नज़रों में ऊँचा उठा रहा था।

                                               क्रमश: ...

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (20-05-2014) को "जिम्मेदारी निभाना होगा" (चर्चा मंच-1618) पर भी होगी!
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन धरती को बचाओ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. सारे मुसलमान आतंकी नही होते पर अधिकतर आतंकी मुसलमान होते हैं इसी वजह से यह सोच समाज में बनती जा रही है। परंतु मेराअपना निजि अनुभव भी बहुत अच्छा रहा है। अगली कडी का इन्तज़ार है।

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  4. गायत्री जी ,आपका भाव अनुकरणीय है लेकिन यह पूरा सच नही है । न तो हर कोई हर मुस्लिम भाई को आतंकवाद से जोडता है और न ही हर मुस्लिम ( हिन्दू भी ) दुलारेभैया होता है । दरअसल यह एक संकीर्ण सोच है ,कुछ राजनीति से प्रेरित और कुछ घटनाओं से भी । ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो हिन्दू-मुस्लिम के बीच सद्भाव ,उदारता और प्रेम के परिचायक हैं । मैं भी ऐसे सद्भाव और सौजन्य को कई बार महसूस कर चुकी हूँ लेकिन उनका आतंक का पर्याय ( गलतफहमी वश ) बनने के कारणों का विश्लेषण खुले दिल से होना चाहिये राजनीति और तुष्टीकरण को परे रखकर । सिर्फ देश समाज और मानवता की कसौटी पर । यहाँ हर व्यक्ति पहले भारतीय है बाद में हिन्दू या मुसलमान ।

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