शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

दर्पण हमेशा झूठ ही बोलता है...!






सुन्दरता को हमारे समाज ने सर्वोच्च स्थान पर स्थापित कर दिया है... यही वजह है कि आज शारीरिक और मानसिक रूप से अपंग लोगों के प्रति समाज का व्यवहार बहुत ही गंदा है,क्योंकि उनका शरीर और चेहरा विकृत हो जाता है, जिससे वे इनकी SO CALLED सुन्दरता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते...भले ही वो कितने ही गुणवान क्यों ना हो...। और शायद यही वजह है कि लोग किसी के चेहरे पे एसिड फ़ेंकने से बाज नहीं आते, क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि ऐसा करके वो उनकी सुन्दरता को नष्ट करके उनकी ज़िन्दगी नरक बना सकते हैं।
 
सुन्दरता वो भयानक सच है, जिसके लिए ना जाने कितने मासूम किन्तु असुन्दर लोग नित्यप्रति सूली पर चढ़ा दिए जाते हैं। ऐसा सदियों से होता आया है और शायद आने वाली अनगिनत सदियों तक होता रहेगा; अगर हम जल्दी ही नहीं चेते तो। जब तक खूबसूरत लोगों की तारीफ़ की जाती रहेगी, तब तक बदसूरत लोगों को प्रताड़ना मिलती रहेगी या अन्य शब्दों में कहें तो जब तक खूबसूरती को एक गुण माना जाता रहेगा, असुन्दर होना एक अवगुण बना रहेगा।
 
मैं सुन्दरता को कोई गुण नहीं मानती, पर शायद आप मानते हैं; तो क्या आप किसी ऐसी बेहद खूबसूरत लड़की से शादी करना पसन्द करेंगे, जो मानसिक रूप से अक्षम हो? आप शायद आश्चर्य से मेरी तरफ़ देखेंगे और हँस देंगे कि पागल है!
पर मैं यहाँ पर एक सवाल पूँछना चाहती हूँ कि जब खूबसूरती स्वयं में एक गुण है, ( और शायद आप लोगों की दृष्टि में एक सर्वोत्तम गुण है, क्योंकि उसके सामने तो और सभी गुण फ़ीके पड़ जाते हैं ) तो उसे किसी और गुण के सहारे की आवश्यकता क्यों है? हम किसी लेखक को तो अपनाने से पहले नहीं पूँछते कि आप अच्छा गाते तो हैं ना या किसी फ़ुट्बालर से नहीं पूँछते कि नृत्य में प्रवीण हो या नहीं?
 
हो सकता है कि ये प्रश्न भी आपके मन के किसी कोने में हिचकी ले रहा हो कि अगर किसी की सुन्दरता की तारीफ़ कर भी दी, तो किसी अन्य का क्या बिगड़ गया? इस बारे मे मैं इतना ही कहूँगी दोस्त! कि जब आप किसी को लड़का, धनी या सुन्दर होने के लिए क्रेडिट देते हैं, तो सीधी सी बात है कि आप इनके विपरीत गुण वालों को कमतर मानते हैं।
ये कहने से काम नहीं चलता कि मेरे मन में कुछ नहीं है।
 
वैसे अगर आप मुझसे पूँछें तो किसी को प्यार करने के लिए सुन्दरता तो क्या किसी अन्य गुण के होने की भी कोई आवश्यकता नहीं। क्या हम इतने स्वार्थी हैं कि किसी की काबलियत को देखकर प्यार करेंगे? यही वजह है कि किसी भी कलाकार के सर्वश्रेष्ठ समय में हम उसे प्यार देते हैं, परन्तु बुरे समय में उसे अँधेरी गलियों में भटकने को छोड़ देते हैं। शायद इन्हीं वजहों ने इस कहावत को भी जन्म दिया होगा कि,
 
‘चढ़ते सूरज को तो हर कोई सलाम करता है।’
 
वस्तुओं को उपयोगी ना होने पर हम फ़ेंक देते हैं या खरीदते समय उसकी सुन्दरता और टिकाऊपन देखते हैं, पर मानव-मात्र के साथ ऐसा व्यवहार मानवता को शर्मसार करता है दोस्तों!
 
पूरा लेख पढ़ने के बाद भी आप लोगों के मन में ये प्रश्न अभी भी हिलोंरे अवश्य मार रहा होगा कि सुन्दरता को एक गुण क्यों ना माना जाए, जबकि वो है; तो इसके जवाब में मैं यही कहूँगी कि गुण वो होता है, जो कभी नष्ट नहीं होता, निरन्तर प्रयास से गुण निखरता है और बाँटने से बढ़ता भी तो है। पर दूसरी तरफ़ आप खुद ही देखिए कि सुन्दरता ना तो प्रयास से और ना ही बाँटने से ही बढ़्ती है और इसे नष्ट होने में भी पल-छिन नहीं लगता।
 
तो आप इसे गुणों के सिंहासन से उतारिए और ये मानिए कि ‘दर्पण हमेशा झूठ ही बोलता है।’
 
नोट:- कुछ लोगों का ये कहना है कि मैं स्वयं सुन्दर नहीं हूँ, इसलिए सुन्दरता को गुण नहीं मानना चाहती। परन्तु दोस्तों सच तो ये है कि शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम तथा किसी बीमारी या अन्य कारणवश कुरूप हुए लोगों को समाज में उनका सर्वोत्तम स्थान दिलाने के लिए ये अत्यन्त आवश्यक है। शायद यही प्रेरणा मेरे इस लेख को लिखने का कारण बनी और सच तो ये है है कि मैं इसे एक आन्दोलन बना देना चाहती हूँ। बस आपका साथ चाहिए.....  :))
 
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3 टिप्‍पणियां:

  1. खूबसूरती या बदसूरती पर पूर्वाग्रही होना उचित नहीं है। कत्तई आवशयक नहीं है कि खूबसूरत लोगों का स्वभाव अच्छा नहीं होता , या खूबसूरत नहीं दिखने वाले हमेशा विनम्र होते हों , यह प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर है !

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (14-12-13) को "वो एक नाम" (चर्चा मंच : अंक-1461) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. कुछ लोगों का ये कहना है कि मैं स्वयं सुन्दर नहीं हूँ| ऐसी बातें लोह किसे को भी नेकी करते देख किया करते हैं | इनपे कान धरने की आवश्यकता नहीं होती | हाथी से सीख लें कुत्ते भोंकते रहते हैं हाथी निकल जाता है |

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