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बुधवार, 27 अप्रैल 2016

गूँगी.. (संस्मरण)









गूँगी..... आसपास के सभी लोग उसे इसी नाम से बुलाते थे। बोल-सुन नहीं पाती थी वो। मुझे लगा अपना नाम ना बता पाने की असमर्थता के चलते ही लोग उसे इस नाम से पुकारने लगे होंगे। पर एक दिन जब वो अपनी भतीजी के साथ होली का बायना लेने हमारे घर आई, तो उसकी भतीजी के द्वारा ही मुझे इस सच का पता चला कि उसका कोई नाम रखा ही नहीं गया था, सब घर वाले भी उसे ‘गूँगी’ ही कहते थे। उस एक क्षण को मन में ये विचार आया कि अच्छा है उसे ज़रा भी सुनाई नहीं देता, वरना इस समाज की कठोरता उसे भीतर तक तोड़ देती और ये जो हर समय उसके चेहरे पे मुस्कान खिली रहती है, इस से भी हम सब वंचित रह जाते। वैसे नियति ने जो क्रूर खेल उसके साथ खेला था, उसे तो वो कब का अपने आत्मबल से पछाड़ चुकी थी। भले ही लोगों ने उसे लाचार समझा हो, पर उसने कभी खुद को दूसरों पर बोझ नहीं बनने दिया और अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए अपना पारिवारिक पेशा अपना लिया। जी हाँ, हमारे यहाँ टॉयलेट शीट साफ़ करने आती थी वो, वही जिसे आपका So Called समाज ‘भंगन’ की उपाधि से नवाजता है।

यूँ तो वो आसपास के सभी घरों में काम करती थी, पर मुझसे एक अजीब सा रिश्ता जोड़ लिया था उसने। जब तक मुझसे वो २-४ बातें ना कर ले, उसे चैन नहीं पड़ता था। इतने दिनों में उसने मुझे और मैंने उसे इशारों में अपनी बात समझाना सीख लिया था। एक दिन आई तो बड़ी देर तक हँसती रही। वजह पूछी तो बोली कि आपसे २ घर छोड़कर जो घर है, उन्हें जरा भी समझ नहीं है। एक के बाद एक ४ बच्चे हैं उनके और सब १-१ साल के अन्तर पर। जबकि केवल २ बच्चे होने चाहिए और उनमें भी ३-४ साल का अन्तर जरूर हो। फ़िर खु़द ही आगे बताने लगी कि उसके खुद के २ लड़के हैं, एक ४ साल का और एक ८ साल का। उस दिन मुझे पता चला कि वो शादी-शुदा है। ये पूछने पर कि उसका पति कहाँ है, बोली.. ‘छोड़ दिया उसे, बहुत मारता था मुझे’। उसका बड़ा बेटा पति के पास ही था और छोटे को ये अपने साथ ले आई थी। अचानक ही बड़े बेटे को याद करके उसकी आँखें भर आईं। फ़िर थोड़ी देर में ही उत्साहित होकर बोली ‘मैं अपने इस बेटे को खूब पढ़ाउँगी, खूब पैसे कमायेगा बड़े होकर। फ़िर अपने बड़े बेटे को भी अपने पास ले आउँगी’

उस दिन उसकी बातें सुनकर मैं अचरज के सागर में गोते लगाती रही। वो तो चली गई, पर मुझे लहरों के बीच डूबता-उतराता छोड़ गई। मैं यही सोचती रही कि आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियाँ भी अपने पति की ज्यादती को अपना नसीब मानकर सहती रहती हैं, शायद समाज ने यही उन्हें घुट्टी में पिलाकर बड़ा किया है। पर ‘वो’ एक समाज से निष्कासित जाति में पैदा होकर भी खुद को अपने बूते खड़ा रखने का हौसला रखती है, हर जुल्म को सहने से इन्कार करती है; अनपढ़ होते हुये भी इतनी समझदारी की बातें करती है और सबसे बड़ी बात, शारीरिक रूप से अक्षम होने के बाद भी किसी के समक्ष झुकने से इन्कार करती है। शायद तभी स्त्री को ‘आदिशक्ति’ के नाम से विभूषित किया जाता होगा।


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मंगलवार, 14 अगस्त 2012

नारी स्वातंत्र्य के असली मायने...



आपने अक्सर लोगों को नारी स्वतंत्रता के विषय में बात करते सुना होगा और शायद लोगों की नज़र में काफी हद तक नारी स्वतन्त्र हो भी चुकी है, पर क्या ये स्वतंत्रता सही मायने में नारी-स्वातंत्र्य है... क्या वेशभूषा, भाषा में क्रांतिकारी बदलाव, घूमना-फिरना, मनमानी आज़ादी यही नारी स्वतंत्रता है? क्या हासिल हुआ इस स्वतंत्रता से समाज को और नारी को भी.....??

सही मायनों में कहें तो इस आज़ादी से समाज दरकने लगा है, मूल्यों में गिरावट आई है... आज बच्चे माओं से दूर हो रहे हैं, जिससे उनमें अपसंस्कृति का विकास हो रहा है, समाज से अलग उनकी एक नयी ही दुनिया बन गयी है... एक समय में कहा जाता था कि नारी जगत-जननी है, जो आज मिथ्या साबित हो रहा है...

असल में देखा जाये तो आज भी नारी उतनी ही बंधन में है, जितनी पहले थी ( मुश्किल से १०% बदलाव आया होगा )... मैं यहाँ मानसिक सोच में स्वतंत्रता की बात कर रही हूँ... कितनी लड़कियां हैं, जो दहेज़ के खिलाफ आवाज़ उठाती हैं...? कितनी नारियां हैं, जो
अपने गर्भ में पल रहे मादा-भ्रूण की हत्या रोक पाती हैं...? कौन घरेलू-हिंसा के खिलाफ बोलता है...? कौन-सी नौकरी करने वाली लड़की अपने पति से पूछे बिना अपने वेतन में से कुछ रूपये अपने माता-पिता को देती है...? बहु बन कर सास-ससुर की सेवा तो करती हैं, पर क्या भाई ना होने पर अपने माता-पिता को घर ला कर उनकी जिम्मेदारी उठा सकती हैं...? क्या अपने परिवार से लड़ कर उतनी ही सुख-सुविधा अपनी बेटी को दे सकती हैं, जो उनके बेटे को मिलती है और सबसे बड़ी बात क्या वो पढाई करने, नौकरी करने, विवाह करने जैसे निर्णय स्वयं ले सकती है...? नहीं ना...?
फिर किस मायने में आप कह सकते हैं कि आज नारी स्वतन्त्र है...?

नारी के स्तर में सुधार की बात तो बाद में करेंगे, शुरुआत कन्याओं से कीजिये, जिन्हें आप देवी का अवतार कहते हैं... सबसे पहले तो उन्हें जन्म लेने और जीने का अधिकार दीजिये... उनका सही लालन-पालन कीजिये और उन्हें स्वतन्त्र निर्णय लेने के योग्य बनाईये... समाज में अपने बूते खड़े होने और समाज को सही दिशा देने का माद्दा उनमें पैदा कीजिये... नर और नारी किसी मायने में भिन्न नहीं, बस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं... बस हमें अपना नजरिया भर बदलने की देर है, नजारा अपने-आप बदल जायेगा.....

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