सोमवार, 2 दिसंबर 2013

श्रद्धांजलि एक महान पुरुष को...! (२)




गांधीजी को श्रद्धांजलि की श्रृंखला में आज एक और कड़ी...

 

 

सबसे ज्यादा अगर लोग गाँधी को किसी बात पर धिक्कारते नज़र आते हैं तो वो इस बात पर कि उन्होंने देश का बंटवारा करवा दिया... साथ ही वो लोग भी जो ऐसा नहीं मानते, उनके मन में भी कभी-२ ये प्रश्न ज़रूर उठता होगा कि क्यों, आखिर क्यों गांधीजी देश के बंटवारे पर सहमत हो गए, जबकि उन्होंने कहा था की देश  का विभाजन मेरी लाश पर होगा...

पर जहाँ तक मैं गांधीजी को समझ पाई हूँ, उनकी स्थिति उन माता-पिता की तरह हो गयी थी, जो एक-दूसरे के खून के प्यासे अपने पुत्रों की सुख-शांति के लिए उन्हें अलग कर देते है... शायद आपको याद नहीं हैं उस समय की परिस्थितियां, जब हिन्दू और मुसलमान, जो एक-दूसरे को अपने पडौसी से ज्यादा भाई मानते थे, अब उनके खून के प्यासे हो गए थे... कैसे देख पाते गाँधी जी अपने ही बच्चों का खून इस तरह बहते हुए...

गाँधी जी पर इलज़ाम लगाने वाले लोग शायद उन २७ दिनों को भूल जाते हैं, जब गाँधी जी ने देश का बंटवारा रोकने के लिए जल तक ग्रहण नहीं किया था... ये खून-खराबा देख कर उनका ह्रदय चीत्कार कर उठा था...  उन्हें पटेल और राजगोपालाचारी द्वारा समझाया गया कि अब ये विभाजन रुकना मुश्किल है,  क्योंकि कुछ कुत्सित लोगों की सोच ऐसा होने नहीं देगी, आप भले ही अपने प्राण त्याग दें... इस पर गाँधी जी सहमती देने पर मजबूर हो गए, पर उन्होंने अन्न-ज़ल ग्रहण करने की स्वीकृति तभी दी, जब हिन्दू और मुसलमान अपने-२ अस्त्र-शस्त्र छोड़ कर ये प्रतिज्ञा करें कि अब ये खून-खराबा नहीं होगा...

गांधीजी ने विभाजन तो स्वीकार कर लिया था, पर वो अन्दर ही अन्दर पूरी तरह टूट गए थे और ये आज़ादी भी अब उन्हें बेमानी लगने लगी थी...

नमन उस महान विभूति को.....

                                                                               
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गांधीजी के शब्दों में, " हिन्दू और मुस्लिम मेरी दो ऑंखें है..."

अब आप ही बताईये, कैसे कोई व्यक्ति अपनी एक आंख को रोता हुआ और एक आंख को हंसता हुआ देख सकता है...

हम चाहें तो गाँधी को समझ सकते हैं, पर कोशिश ही नहीं करते...
बुराई करने से फुर्सत जो नहीं मिलती...



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