मंगलवार, 18 जून 2013

लप्रेक (लघु प्रेम-कथा)






आरोही जब भी कोई शिकायत करती पलाश से; जवाब में वो कोई फ़िल्मी गीत गाने लगता या किसी शायर की कोई पंक्तियाँ..........। आरोही भी मुस्कुरा कर उसकी तरफ़ देखने लगती और सोचती..........काश..! ज़िन्दगी के हर सवाल का जवाब इतना ही आसान होता, किसी गीत या कविता की तरह और ज़िन्दगी इतनी ही प्यारी होती, बिल्कुल तुम्हारी तरह..........!!

                  
                        x  x  x  x

सोमवार, 20 मई 2013

दुलारी (कहानी)





                (भारतीय सामाजिक व्यवस्था पर एक कटु व्यंग्य)

जिस दिन ‘वो’ विदा होकर आई और उसका तांगा ससुराल की ड्योढ़ी पर रुका। मुहल्ले भर के बच्चों ने उसे घेर लिया। सभी उसकी एक झलक भर पाने को बेताब थे। कोई उसके सुन्दर हांथों की तारीफ़ कर रहा था, तो कोई उसके गोरे-२ पैरों की, साथ में चेहरा देखने की मशक्कत भी जारी थी सभी की।

हटो-२ नज़र ना लगा देना मेरी बहुरिया को... मुझे आरती की रसम पूरी करने दो।.......... उसकी सास ने बड़े ही लाड़ से कहा।

हाँ-२ ‘हूर की परी’ है ना तुम्हारी बहुरिया, जो नज़र लग जाएगी.......... एक पड़ोसन ने उलाहना देते हुए कहा।

पर जो देखता था, देखता ही रह जाता था, बला की खूबसूरती थी उसमें। सुन्दरता के साथ गुणों की खान भी थी वो। थोड़े ही दिनों में अपने नाम के अनुरूप ही पूरे मुहल्ले भर की दुलारी बन गई वो। ‘दुलारी’ हाँ, यही नाम तो था उसका।

वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता। १० साल बीत गये थे उसकी शादी को। अब वो हर एक की आँखों में खटकने लगी थी। कोई उसका दु:ख नहीं समझता था, हर किसी को ताने देने आते थे बस। उसके हर बच्चे की जन्म के कुछ महीनों बाद किसी ना किसी वजह से मृत्यु हो जाती थी। लोगों की नज़र में अब वो एक डायन बन चुकी थी, जो अपने ही बच्चों को खा जाती है।

जब किसी लड़की की मुहल्ले में शादी होती और विदा के वक्त आम रस्म के मुताबिक वो सबसे गले मिलती, तो दुलारी भी मन में उस लड़की के लिए दुआएँ लिए लपककर आगे बढ़ती, पर हमेशा ही कुछ लोगों की आवाजें उसके बढ़ते कदम रोक लेतीं..........

अरे.....! इसके गले मत लगना। ये डायन तुम्हारी गोद भी सूनी कर देगी।

कुछ देर वहाँ खड़ी रहने के बाद चुपचाप घर वापस चली आती और एक कोने में बैठकर सुबकने लगती। उसे सुबकता देख सास (जिसने अपने प्यार की छाँव हमेशा उसके सिर पर बनाये रखी) उसे डाँटती,

‘क्यों जाती है वहाँ? जब जानती है उनके व्यवहार को।’
और प्यार से उसका सिर गोद में रखकर सहलाने लगती।

पर क्या करती दुलारी। दिल में प्यार ही इतना भरा था। जब भी कोई लड़की पहली बार मायके आती या किसी के यहाँ सन्तान होती, तो भागी-२ पहुँच जाती वहाँ पर। ये जानते हुए भी कि दरवाजे से ही वापस लौटना पड़ेगा।

धीरे-२ वक्त बीतता रहा। ना तो मुहल्ले वाले ही बदले और ना ही दुलारी।

जिस दरवाजे पर उसकी डोली उतरी थी, आज उसी दरवाजे पर उसकी अर्थी रखी थी।

लाल जोड़े में सजी-सँवरी, पूरे साजो-श्रंगार के साथ। चेहरा दमक रहा था उसका। बिल्कुल चाँद का टुकड़ा लग रही थी दुलारी।

‘सुहागिन मरी है।’

‘बड़े भागों वाली है।’

‘अरे इसके चरण छूकर आशीष ले लो।’

‘इसके हाथ से उतार कर एक-२ चूड़ी पहन लो।’

‘इसकी माँग से सिन्दूर लेकर अपनी माँग में भर लो।’

सभी मुहल्ले वाले आपस में बातें कर रहे थे...............................।

जब अर्थी को लेकर चले, तो सभी सुहागनें एक-२ कर उसकी अर्थी के नीचे से निकलने लगीं।

आज ‘वो’ फ़िर से सबकी ‘दुलारी’ बन गई थी...............
                    
                    x     x     x     x

मंगलवार, 5 मार्च 2013

हेल्थ पॉलिसी लेना कितना जरूरी ?







हमारे एक परिचित आजकल बहुत परेशान रहते हैं, वो इतना टूट गये हैं कि ज़िन्दगी से ही मुख मोड़ लिया है उन्होंने। बार-२ एक ही बात उन्हें झकझोरती है कि क्यों नहीं उन्होंने हमारी बात मान ली थी, जो हमने उनसे २ साल पहले कही थी। हमने उन्हें Health Insurance कराने की सलाह दी थी, जो उन्होंने हँसते हुए यह कहकर सिरे से ही नकार दी थी कि हमें इसकी क्या जरूरत है। हमारे घर में तो किसी को बुखार भी आने से पहले दो बार सोचता है। बेकार में ही हर साल इतने रूपये बरबाद करने से कोई फ़ायदा ?

एक वो दिन था और एक आज का दिन है। कुछ महीने पहले पता चला कि उनकी पत्नी को कैंसर है और आखिरी स्टेज़ है। ऑपरेशन में ४ लाख रूपये खर्च हो गये। उसके बाद भी ना तो उनकी पत्नी ही ठीक हुईं और ना ही रूपये का बेसाख्ता खर्च होना बन्द हुआ। कुछ लोगों के लिए ४ लाख रूपये ज्यादा बड़ी रकम नहीं होगी, पर उस आम इन्सान का क्या, जिसकी सालाना आय ही १ लाख रूपये मुश्किल से होती हो और बचत १०,००० से भी कम।

उनके पास आज अफ़सोस करने के सिवाय और कोई चारा नहीं, परन्तु क्या हम उनसे कोई सीख नहीं ले सकते। वैसे अगर बारीकी से देखा जाए, तो इसमें सिर्फ़ उनकी ही गलती नहीं, गलती हमारी सरकार की भी है, जो हेल्थ पॉलिसी के प्रति लोगों को जागरुक करने में कोई कदम नहीं उठाती। अन्य बड़े देशों जैसे- अमेरिका, रूस, जर्मनी, ब्रिटेन आदि में तो आप बिना अपना इंस्योरेंस कराये, वहाँ बसने की सोच भी नहीं सकते।

मुझे भी इसका ज्ञान आज से २ साल पहले हुआ, जब अपनी बेटी को एड्मिट कराने के लिए हॉस्पीटल ले गई और उनका मुझसे पहला सवाल ये था कि क्या आपके पास कोई हेल्थ पॉलिसी है? और मेरा जवाब ना में होने पर उनका कहना था कि फ़िर तो सारा खर्च आपको खुद ही करना होगा। उस समय भी मुझे इसकी उपयोगिता का अहसास नहीं था। पर धीरे-२ जब खर्च बढ़कर ७ लाख रूपये हो गया और हम सिर से पैर तक कर्ज़ में डूब गये; तब हमें ये अहसास हुआ कि हमसे कितनी बड़ी गलती हो गई। पर शायद ये गलती हमारी नहीं थी, क्योंकि हमें तो इसके बारे में पता ही नहीं था। हमने हॉस्पीटल से ही पॉलिसी के बारे में जानकारी एकत्रित की और वहाँ से लौटते ही पूरे परिवार का Health Insurance करा लिया।

आप में से कइयों के मन में ये सवाल उठ सकता है कि प्राइवेट हॉस्पीटल जाने की जरूरत ही क्या है? सरकारी अस्पताल भी तो हैं, जहाँ कोई पैसा खर्च नहीं होता; तो मैं उन लोगों से सिर्फ़ यही कहना चाहूँगी कि शायद आप सरकारी अस्पतालों की हालत के बारे में नहीं जानते और AIIMS जैसे बड़े अस्पतालों में तो इतनी भीड़ होती है कि नम्बर आते-२ ही महीनों लग जाते हैं। वैसे भी अगर वहाँ बेड खाली ना हो, तो वहाँ से वापस भेज दिया जाता है। जहाँ तक इमरजेंसी की बात है, तो उस समय मरीज की हालत को देखते हुये दूरी को प्राथमिकता दी जाती है ना कि प्राइवेट या सरकारी अस्पताल को; अर्थात्‌ जो अस्पताल सबसे नजदीक हो, वहाँ मरीज को ले जाया जाता है।

हाँ, तो मैं बात कर रही थी हेल्थ पॉलिसी की। हॉस्पीटल से लौटने के बाद मैंने अपने सभी परिचितों को इस बारे में जागरूक किया और अब इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी लोगों तक ये बात पहुँचाने की कोशिश कर रही हूँ। सिर्फ़ ६,००० रू० प्रतिवर्ष खर्च करके आप स्वास्थ्य-सम्बन्धी अचानक घटने वाली आपदाओं से स्वयं को मुक्त रख के खुश रह सकते हैं; और ये ६,०००/- केवल एक व्यक्ति का नहीं, पूरे परिवार का Insurance है। आप इसे प्रति-व्यक्ति का भी करा सकते हैं। वैसे अलग-२ हैसियत और अलग-२ जरूरत के मुताबिक कई तरह के प्लान मार्केट में उपलब्ध हैं, जिसकी जानकारी आप policybazar.com पर जाकर ले सकते हैं और Toll Free No. से आप कॉल भी कर सकते हैं। वे बड़े ही धैर्यपूर्वक आपको पूरी जानकारी देते हैं। वैसे Apollo Munich और ICICI का Family Floater आम मध्यम वर्ग के लोगों के बीच काफ़ी लोकप्रिय है।

वैसे मैं सरकार और समाजसेवी संस्थाओं से आग्रह करूँगी कि वे लोगों के बीच हेल्थ पॉलिसी के प्रति जागरूकता पैदा करें और उन्हें एक स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रेरित करें।

तो फ़िर मिलते हैं, कुछ नए विचारों एवं नई जानकारियों के साथ। तब तक के लिए अलविदा दोस्तों.....।   :) 

                         x   x   x   x   x   x   x   x


शनिवार, 1 दिसंबर 2012

इतना बेफ़िक्र भी मत हो ज़िन्दगी...!







किसी का जरा सा लालच और हम में से ही कुछ लोगों की ज़रा सी बेफ़िक्री कितनी बडी घटना और तबाही का वायस हो सकती है, यह अभी हाल की ही एक घटना से प्रकाश में आया है। एक प्राइवेट हास्पीटल की एक नर्स के लालच से एक हँसता-खेलता परिवार तबाह हो गया। वह नर्स हास्पीटल के ब्लड-बैंक में तैनात थी और पैसों के लालच मे जाँच-प्रक्रिया से अस्वीकृत हुये रक्त को भी मरीजों के लिए दे देती थी।

उसके इस लालच का शिकार हुआ एक परिवार; और कुछ ही दिनों में हँसता-खेलता परिवार मौत के मुँह में समा गया।

इस परिवार में पति-पत्नी, उनकी तीन पुत्रियाँ और एक पुत्र था। पत्नी की पहली गर्भावस्था के समय रक्त चढाया गया, जिससे उसमें एड्स के वायरस पहुँच गए। उसके द्वारा परिवार के सभी सदस्यों तक एड्स का दानव पहुँच गया, पर उनकी बेफ़िक्री की ज़िन्दगी ने उन्हें इसकी खबर नहीं होने दी।

ज़िन्दगी की भयानकता जब सामने आयी, तो पूरे परिवार को लील कर ही मानी। एक दिन अचानक पत्नी का चेहरा अजीब तरह के छालों से भर गया। हास्पीटल में जाँच से पता चला कि उसे एड्स है और अन्तिम स्टेज है; अगले ही दिन पुत्र के साथ भी यही घटना हुई और जाँच के बाद सभी को एड्स होने की पुष्टि हुई और कुछ ही दिन बाद पत्नी और पुत्र की मौत हो गई, क्योंकि वे अन्तिम स्टेज पर थे।

पिता और तीनों पुत्रियों ने इस गम से उबरकर अपना इलाज़ प्रारम्भ किया और ज़िन्दगी से दो-२ हाथ करने की ठान ली। हौसले की प्रतिमूर्ति था पूरा परिवार। परन्तु समाज को उनकी ये ज़िन्दादिली रास नहीं आई और वही हुआ जो एक “So called Society’’ से अपेक्षा की जा सकती है।

तीनों बच्चियों को स्कूल से निकाल दिया गया, क्योंकि साथियों ने साथ बैठने से और गुरुओं ने ग्यान देने से इन्कार कर दिया था। रिश्तेदारों ने भी साथ छोड़ दिया (जो कि ऐसे वक़्त पर हमेशा ही अकेला छोड़ देते हैं)। हद तो तब हो गई, जब बड़ी बेटी के प्रेमी ने भी (जिसके लिए कभी वो परी समान हुआ करती थी) उसे ठुकरा दिया। जब प्यार से थामने वाला हाथ दगा कर जाये, तो इन्सान के सारे हौसले पस्त हो जाते हैं और यही हुआ उस लड़की के साथ।

वो शायद जानती थी कि उसके बाद उसकी बहनें इस समाज के भेड़ियों का सामना नहीं कर पाएँगी, पापा शायद कर लें। उसने अपनी बहनों को दवा की जगह ज़हर देकर खुद भी मौत को गले लगा लिया; शायद सुकून से मरने के लिये, जीना तो उनकी किस्मत में था ही नहीं शायद।

स्तब्ध हैं ना.....?? देखकर कि किस तरह ये समाज हौसलों को तोड़ने की क्षमता रखता है। सँवारना कब सीखेंगे हम? शायद कभी नहीं। तो क्या कहते हैं आप? हम सब मिल कर एक कदम बढ़ाएँ आज से ही...................???


एक विशेष बात:-  कृपया हर तीन साल पर अपने परिवार की एक बार एड्स जाँच जरूर करवाएँ। बेफ़िक्री अच्छी है, पर जिम्मेदारी के साथ। आभार...!

                     x  x  x  x 

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

श्रद्धांजलि एक महान पुरुष को...!






आज मैं उस विषय पर संक्षेप में लिखने जा रही हूँ, जो अक्सर ही मेरे मर्म को भेदता है... मैंने ये महसूस किया है कि लोगों के बीच में गाँधी की बस इतनी सी पहचान है कि उन्होंने भगत सिंह को मरवा दिया, अंग्रेज सरकार से उन्हें बचाने के लिए भीख नहीं मांगी...

इस विषय में मैं इतना ही कहूँगी कि गाँधी को समझना इतना भी आसान नहीं, विरोध में तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है...

जहाँ तक भगत सिंह को बचाने की बात है, तो भगत सिंह मरे नहीं थे, शहीद हुए थे और शहीद स्वयं देशहित में अपने प्राण त्यागते हैं, जो कि भगत सिंह ने भी किया... एक शहीद को बचाने की बात करना उनका अपमान करना हुआ...गाँधी जी और भगत सिंह आपस में कितना प्रेम करते थे, ये लोगों की समझ से परे का विषय हो सकता है...

आगे भी मैं गाँधी जी से जुड़े हुए कुछ पहलू और उनसे जुडी हुयी भ्रांतियों से आपको परिचित कराती रहूंगी, जो अक्सर मेरे मन को व्यथित करते रहते हैं...

ये मेरी श्रद्धांजलि होगी उनके लिए...

                                            x  x  x  x

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

पाषाण हृदय.....!


 मुझे उनकी काया पाषाण की तरह लगती थी हमेशा। क्‍योंकि उस काया में सोच के ही बवंडर उठते थे, वो सोच जिसका रास्‍ता सिर्फ मस्‍तिष्‍क से होकर जाता था। उस रास्‍ते पर दूर-2 तक कोई पगडंडी नहीं दिखाई देती थी, जो दिल को छू कर भी गुजरती हो। जिन्‍दगी के हर फलसफे को तराजू में तौल कर देखते थे। प्‍लस-माइनस में ही फिट होते थे, उनके गणित के हर फार्मूले। कभी-2 लगता है कि क्‍या पाषाण इतना कठोर होता है कि जिस घटना का आवेग करोड़ों लोगों के आँसुओं का समन्‍दर बना कर बहा दे, वह उस व्‍यक्‍ति को तिल भर भी डिगा ना पाई। क्‍या जिन्‍दगी सिर्फ लाभ-हानि का खेल भर है? क्‍या आपको नहीं लगता कि कभी-2 हमें माइनस वाले पलड़े पर बैठ कर भी जिन्‍दगी का नये सिरे से विश्‍लेषण करना चाहिये।

दो बेटे थे उनके।

आज सुबह ही उनके बड़े बेटे का फोन आया था। खुशखबरी सुना रहा था, पर कुछ दर्द के साथ। बेटी हुयी थी उसकी, पर दर्द की वजह बेटी नहीं थी। उसे रह-2 कर याद आ रही थीं डॉक्‍टर की कही बातें।

‘‘ मस्‍तिष्‍क में पानी भर गया है, ऑपरेशन करना पड़ेगा, बचने की संभावना काफी कम है। अगर बच भी गयी, तो मानसिक रुप से विकलांग हो सकती है आपकी बेटी।‘'

अचानक पिता की आवाज से बेटे की तंद्रा टूटी। डॉक्‍टर के कहे अन्‍तिम वाक्‍य को उसने ज्‍यों का त्‍यों दोहरा दिया।

‘‘ हमें आपकी राय की जरुरत है, तभी हम कोई निर्णय ले सकते हैं।''

‘‘ दिमाग तो नहीं खराब हो गया है तुम्‍हारा? जिन्‍दगी भर एक अपाहिज को सीने से लगा कर रखोगे? ''

‘‘ और फिर डॉक्‍टर ने क्‍या कहा कि मरने की सम्‍भावना ज्‍यादा है, तो क्‍यों बेवजह ऑपरेशन में लाखों रुपये बरबाद कर रहे हो? वैसे भी इस महंगाई में घर का खर्च चलाना मुश्‍किल पड़ता है। और मुझसे तो कोई उम्‍मीद भी मत रखना तुम।''

चेहरा सफेद पड़ गया प्रशान्‍त का अपने पिता की बात सुनकर। शायद आखिरी आशा भी खत्‍म हो गई थी उसकी, दिल बैठ गया उसका। बेमन से डॉक्‍टर को मना कर दिया उसने, अनमने भाव से उस फूल सी गुड़िया को घर ले आया।

सुबह से शाम हो गई, पर वो उसके झूले के पास से नहीं हटा। पूरा कमरा खिलौनों से भरा हुआ था। कितने नाजों से सजाया था उसने ये कमरा, अपनी आने वाली सन्‍तान के लिए। और वो तो एक बेटी ही चाहता था।

एकटक देखे जा रहा था उसके चेहरे को वो। अचानक उसने देखा, उस फूल सी नाजुक बच्‍ची का चेहरा एक ओर लुढ़क गया है। चली गयी थी वह परी इस दुनिया से, एक पाषाण हृदय की कठोरता का शिकार होकर।

अपने पिता को तो वो माफ नहीं ही कर पाया, साथ ही साथ खुद भी टूटता रहा वो अन्‍दर ही अन्‍दर। शायद कहीं भीतर अपने आप को भी दोषी मान रहा था वह। कुछ ही दिनों में हड्‌डी का ढाँचा हो गया था, शरीर एकदम पीला पड़ गया था।

आज पता नहीं क्‍यों सुबह से वह अपनी बेटी के कमरे में था। दीवार का सहारा लेकर एकटक उस झूले को ताके जा रहा था, जिसमें उसकी बेटी ने अपनी ज़िन्‍दगी के कुछ क्षण बिताये थे। झूले को ताकते-2 कब उसकी आत्‍मा अपनी बेटी से मिलने के लिए प्रस्‍थान कर गई, खुद उसे भी उसका अहसास नहीं हुआ।

उसके मृत शरीर को उसके पिता अपने साथ ले गये, अन्‍तिम क्रिया-कर्म के लिये। उनके छोटे बेटे को तो अब तक इस स्‍थिति का भान ही नहीं था, होता भी कैसे; वो तो एक जरुरी मीटिंग के लिए बाहर गया था।

अचानक कुछ शब्‍द गूँजे,

‘‘ जल्‍दी कीजिए, ‘बॉडी' को ले जाने का इन्‍तजाम कीजिए। अभी थोड़ी देर में सूरज सिर पर चढ़ आएगा और मुझसे धूप में चला नहीं जाता।''

ये शब्‍द थे उसके पिता के, जो उन्‍होंने अपने घर के सामने इकट्‌‌ठा लोगों से कहे थे।

‘‘ लेकिन आपका छोटा बेटा, वो तो अभी तक आया नहीं, उसका इन्‍तजार नहीं करेंगे आप? '' - पीछे से किसी की आवाज आई।

‘‘ नहीं, बेवजह उसका नुकसान क्‍यों करवाउँ। ''

‘‘ वैसे भी, कौन सा, उसके आने से जाने वाला लौट आयेगा। ''

माहौल में निस्‍तब्‍धता छायी है, लोग उनके चेहरे को देख रहे हैं।

नेपथ्‍य से कुछ लोगों के रोने की आवाजें आ रही हैं...............................

                                         x   x   x   x  

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

आस की डोर...




एक बार एक कहानी पढी थी, जो आज तक मेरे ज़ेहन से नहीं निकली है और जब-तब मेरे मस्तिष्क को झकझोरती रहती है... एक सवाल बार-२ उठता है मेरे मन में, क्या प्यार सिर्फ साथ-२ हंसने-खेलने का नाम है ?  शायद नहीं................
जब तक एक की आँख का आंसू दूसरे की आँख से ना निकले, तब तक प्यार की इब्तिदा नहीं होती...

 

साथ-२ जीने-मरने की कसमें खायी थी दोनों ने और विश्वास भी था एक-दूसरे पर, शायद एक-दूसरे से ज्यादा... १७ मई को शादी थी उनकी...
 

"आत्म का आत्म से मिलन, विश्वास की छाँव तले...!"

परन्तु ये विश्वास की दीवार उस दिन भरभराकर कर गिर गई, जिस दिन उन्हें पता चला की लड़की को Bone TV है... शायद अंतिम स्टेज थी..........


लड़की की आँखों के सामने से सारे रंग अचानक ही गायब हो गए, जब उसने लड़के को खुद से दूर जाते देखा... शायद कभी वापस ना लौटने के लिए...............!!

लड़की को हॉस्पिटल में एडमिट करा दिया गया... वो मौत की तरफ एक-२ कदम बढाने लगी... जिन्दगी का हाथ छूटता ही जा रहा था, कितना ही कसकर पकड़ने की कोशिश की उसने, फिर भी... आखिर ज़िन्दगी थी ना..........!!

सिस्टर, एक कैलेण्डर मिलेगा ?  उसने पूँछा..........

एक आस थी, जो छूटने का नाम ही नहीं ले रही थी...............वो आएगा, जरूर आएगा...............!!

एक-२ दिन काटने लगी, कैलेण्डर पर... बहुत जल्दी थी उसे शायद, दिन नहीं कट रहे थे...उसे इंतजार था १७ मई का... आखिर उस एक पल के लिए ही तो जी रही थी वो... वो पल, जब कायनात की सारी खुशियाँ उसकी झोली में आने वाली थीं...उसके विवाह का दिन.................!!

 

दिन बीतते रहे इसी तरह...................

 

पर वो नहीं आया.....................!!

 

आज सुबह से ही उसकी आँखें दरवाजे पर टिकी हैं....................

 

आज १७ मई है...................!!

 

ज़िन्दगी की डोर भी हाथ से छूट गई, उस आस की तरह, सांझ ढलते ही.....
 

मौत को भी आज का ही दिन मुक़र्रर करना था उसके लिए....................!!

                                        

                                                x   x   x   x  
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...